इन दिनों चारो तरफ़ एक ही शोर सुनाई दे रहा है। मंदी, मंदी, मंदी, ... छंटनी, छंटनी, छंटनी.... कुछ बड़े कारोबारी घराने आस लगाए बैठे हैं कि इसी बहाने सरकारी खजाने से कुछ उनके लिए भी निकल आए। कई ने तो महीनों पहले से कर्मचारियों के वेतन भत्तों में में कटौती और अन्यखर्चों में कमी कर दी है।
इसकी मार सबसे ज्यादा झेलनी पड़ रही है अभी अभी पढाई पूरी कराने वाले छात्रों को या उन लोगों को जिन्होंने जूनियर लेबल पर नौकरी शुरू ही की थी। ऊँचे पदों पर बैठे अधिकतर वेतनभोगी अभी भी सुरक्षित हैं हालाकि, उनकी भी साँसें अटकी हुई हैं। एक अनजाने अनदेखे खौफ के कारण। नौकरी से निकाले जा रहे तमाम जूनियर लेबल के नौकरीपेशा लोगों ने शिकायत शुरू कर दी है कि मालिक अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए उनका सर कलम कर रहे हैं।
वैसे एक बात ध्यान आते है। तब मंदी का शोर शुरुआती दौड़ में था। प्रतिष्ठित मीडिया समूह जी न्यूज के मालिक सुभाष चंद्रा का बयान आया कि मंदी ने मीडिया पर असर दिखाना शुरू कर दिया है और अब विज्ञापन कम मिल रहे हैं। यकीन मानिए, इस बयान के बाद जी न्यूज के एक ख़ास कार्यक्रम का विज्ञापन समय देखने से पता चला कि विज्ञापन समय का अनुपात पहले के मुकाबले बढ़ा है, घटा नहीं। ऐसा और मामलों में भी सम्भव है।
आशंकित मंदी से निपटने के उपयोग किए जा रहे तौर तरीके भी संदेहास्पद मालूम पड़ते हैं। अधिकतर जगह निचले स्तर के कर्मचारियों को ही क्यों खामियाजा उठाना पर रहा है? क्या समेकित तौर पर पूरी कंपनी संभावित नुकसान को झेलने के लिए आगे नहीं आ सकती है? वैसे
yah सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या वास्तव में दुनिया भर की आर्थिक उठा पटक ने भारत को भी प्रभावित किया है? अगर हाँ तो क्यों और किस हद तक? क्या पश्चिमी आर्थिक मोडल पर निर्भर होना इसका एक कारण है?
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Friday, February 6, 2009
क्या वाकई मंदी छा गयी है?
प्रस्तुतकर्ता :
ऋतेश पाठक
2
टिप्पणियाँ
पर
2/06/2009 06:35:00 PM
लेबल: अर्थव्यवस्था, मंदी, राष्ट्रीय
Tuesday, June 10, 2008
डीजीपी माने : डीफाईनिंग गवर्निंग पोलिसी
क्यों, चौंक गए शीर्षक देखकर। शायद आप भी इसे सही ठहरायेंगे यदि आपने आज उत्तर प्रदेश के डीजीपी का प्रेस वार्ता में दिया गया बयान सुना हो। गौरतलब है कि उनकी यह वार्ता कई टीवी चैनलों पर लाइव दिखाया जा रहा था। डीजीपी महोदय ने अपने मुख्यमंत्री को उद्धृत करते हुए कहा कि अब प्रदेश में क़ानून का राज रहेगा और पूर्व की सरकारों की तरह अपराधियों को संरक्षण नहीं दिया जाएगा।
एक राज्य के पुलिस महकमे के मुखिया का इस तरह का बयान निहायत ही गैर-जिम्मेदाराना कहा जा सकता है। जब पहले किसी अन्य दल की सरकार थी वर्त्तमान डीजीपी महोदय तब भी निश्चित रूप से पुलिस महकमे में किसी महत्वपूर्ण पद पर रहे होंगे। क्या तब उन्हें मालूम था कि उनकी सरकार अपराधियों को संरक्षण दे रही है। यदि हाँ, तो क्या उनहोंने कभी इसका विरोध किया? नहीं तो क्यों नहीं?
ब्लॉग लिखे जाने तक इस बयान पर विपक्षी दलों की कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी थी लेकिन यह प्रश्न निश्चित रूप से विचारणीय है कि क्या किसी पुलिस अधिकारी को ऐसा बयान शोभा देता है? क्या यह स्थिति संकेत कर रही है कि आने वाले समय में राजनीतिक दल अपने समर्थक अफसरों की फौज तैयार करने में लग जाएंगे?
अगर ऐसा हुआ तो बेचारी जनता का क्या होगा? क्या वह जम्हूरियत के नाटक में बदलते किरदारों के लिए तमाशबीन भर बनी रहेगी?
प्रस्तुतकर्ता :
ऋतेश पाठक
1 टिप्पणियाँ
पर
6/10/2008 01:48:00 PM
Friday, January 25, 2008
सेवा के बहाने: भरते जाओ खजाने
जब भी कोई दिवस आता है, उसे भुनाने के लिए तमाम बिचौलिए पहले से तैयार बैठे होते हैं। बीते बाल दिवस पर मैं एक बस में सफर कर रहा था, मेरे ठीक आगे दो लडके जिनकी उम्र बमुश्किल 12-13 साल होगी, बूट पोलिश के साजो-सामान कंधे पर टाँगे घूम रहे थे। यह स्थिति मेरे लिए कतई आश्चर्यजनक नहीं थी। लेकिन आश्चर्य का विषय इसके बाद आया। उनमें से एक लडके घुटने के पास एक हरे रंग का बैज लगा था जिस पर अंग्रेजी में लिखा था- "I Know my rights, do you? www.cry/....." मुझे झटका सा लगा।
निश्चय ही बांटे गए बैज्स और टोपियों का आंकडा कहीं दिखा कर ऐसी संस्थाएं अपनी पीठ थपथपाती होंगी। और बच्चे किस स्तर तक अपने अधिकार जान पाते हैं, यह आपके सामाने है। अभी हाल ही में केन्द्र सरकार ने भी फर्जी समाजसेवियों की सूची जारी की है। शायद बड़ी मछलियाँ उनमें ना हों।
खैर उस लडके को सिर्फ बैज मिल था या उसके बारे में कुछ ज्ञान भी यह जानने की अपेक्षा मैं सहज पूछ बैठा- "भाई, यह कहाँ से मिला तुम्हें?" लड़का डरते हुए बोला -"कहीं से नहीं, आपको चाहिए क्या?" मैंने जबाव दिया -"नहीं चाहिए, पर मिला कैसे?" फिर उसका जबाव था-"पीवीआर के पास पोलिश कर रहा था तो एक भैया ने शर्ट पर लगा दिया।" मैंने पूछा- "क्यों लगाया?" जबाव था- "पता नहीं, सिर्फ इतना बोला की घर जाने तक लगाए रखना। आपको चाहिए तो ले लो।"
मुझे याद आया कि नौवी कशा में मैंने एक नामी प्रकाशक की किताब खरीदी थी। उस पर cry के लोगो के साथ लिखा था कि उस किताब की कीमत में से एक रूपया बच्चों के कल्याण के लिए खर्च किया जाएगा। उसी समय एक नामी नमक कम्पनी के नमक पैक पर भी ऎसी ही जानकारी होती थी। तब वैसे सामान खरीद कर ख़ुशी मिलती थी। लेकिन यह कल्याण किस तरह हो रहा है वह प्रत्यक्ष देखने का मौका मुझे इस दिन मिला था।
यह संस्था भारत ही नहीं विश्व स्तर पर बाल कल्याण कार्यक्रमों के लिए सुर्ख़ियों में रही है। लेकिन जिस तरह के अनुभव अब मिल रहे हैं, उनको देखते हुए कहा जा सकता है कि कुएँ में भंग पड़ी है, भंग की छोड़ कुआं साफ करने की सोची जाए।....
प्रस्तुतकर्ता :
ऋतेश पाठक
1 टिप्पणियाँ
पर
1/25/2008 02:38:00 PM
